लेखक: aajka papers.com
प्रस्तावना
aajka papers के रिपोर्ट के अनुसार हिंदी स्टैंड-अप के चर्चित कलाकार ज़ाकिर खान ने 17 अगस्त 2025 को न्यूयॉर्क सिटी के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन (MSG) में परफॉर्म किया—यह हिंदी कॉमेडी के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ रहा है। इसी दौरान सोशल मीडिया पर कुछ पुराने वीडियो वायरल हुए, जिनमें महिलाओं को लेकर उनके कुछ सेक्सिस्ट कथन याद किए जाने लगे—जिन्हें लेकर अब उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। आइए जानते हैं इस घटना की पूरी कहानी, और क्या-क्या हुआ न्यूयॉर्क में ज़ाकिर खान के साथ।
(इस लेख को आपके ब्लॉग aajka papers.com पर प्रकाशित किया जा सकता है।)
1. MSG शो: एक शानदार ऐतिहासिक रात
ज़ाकिर खान का MSG पर शो 17 अगस्त, 2025 को हुआ—यह पहली बार था जब कोई हिन्दी कॉमेडियन इस महानगर के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में हेडलाइन कर रहा था न्यूयॉर्क पोस्ट। यह उनकी उत्तर अमेरिकी बड़ी प्रदर्शनी यात्रा का अहम हिस्सा था, जिसमें मैड्रिड से लेकर टोरंटो तक कई स्थान शामिल थे। उन्होंने इस शो को अपने जीवन की “सबसे बड़ी रातों” में से एक बताया, जिसमें कई सरप्राइज गेस्ट भी शामिल थे न्यूयॉर्क पोस्ट।

2. विवाद की शुरुआत: पुरानी क्लिप्स का वायरल होना
MSG में परफॉर्मेंस के दौरान न्यूयॉर्क में, सोशल मीडिया पर ज़ाकिर की कुछ पुरानी क्लिप्स फिर से वायरल हो गईं। एक वीडियो में एक महिला फैन कहती है, “हम आपको पसंद करते हैं ज़ाकिर।” ज़ाकिर ने जवाब में कहा:
“जिसके खर्चे पे आई हो ना, उसको बोलो तुम, ठीक है?”
इस टिप्पणी को कई महिलाओं ने सेक्सिस्ट बताया, क्योंकि इसमें महिलाओं को खर्चों या पुरुष की आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखा गया, निशाना बनाया गया The Statesman। ऐसी टिप्पणियाँ “सख्त लौंडा (Sakht Launda)” के किरदार से जुड़ी हुई दिखाई दीं, जहां ज़ाकिर ‘महिलाओं से दूर रहने वाले भावुक-रहित व्यक्ति’ की भूमिका निभाते हैं—जिस पर आलोचना उठी कि यह पितृसत्तात्मक (misogynistic) विचारधारा से प्रेरित है The StatesmanMediumFeminism in India।
3. सोशल मीडिया और सार्वजनिक प्रतिक्रिया: दो धाराएँ
कोई लोग ज़ाकिर का MSG पर करिश्माई प्रदर्शन और हास्य-शैली का समर्थन कर रहे हैं, जबकि आलोचक उनकी पुरानी टिप्पणियों को वर्तमान समय में माफ नहीं कर पाए। सोशल मीडिया पर यह बहस फैलती गई—कुछ फॉलोअर्स ने लिखा कि “कॉमेडी में महिलाओं के साथ माकूल मज़ाक की सीमाएं होनी चाहिए”, वहीं आलोचकों ने इसे “कॉमेडी के पीछे मास्क पहनकर पितृसत्ता को सामान्य बनाना” बताया। इस कामेंट्री ने कॉमेडी और अपेक्षाकृत सामाजिक जिम्मेदारी के बीच की जद्दोजहद उजागर की।
4. ज़ाकिर की प्रसिद्ध “Sakht Launda” पर्सोना: आकर्षण या विवाद?
ज़ाकिर का “Sakht Launda” किरदार उन्हें लोकप्रिय बनाने में अहम रहा है—जहाँ वे निर्लिप्त और भावनाओं से दूर रहने वाले व्यक्ति का चित्रण करते हैं। इस पर्सोना ने उन्हें कई हिट फ्रेज़—जैसे “सख्त लौंडा”, “सिंगल मगर हक से”, और “हम्म, अच्छा, ठीक है”—दिया MediumFeminism in India।
लेकिन आलोचना यह रही कि यह सिर्फ हास्य नहीं, बल्कि महिलाओं को सतह पर आधारित स्टीरियोटाइप में बांट देना है—जैसे, ‘ज़्यादा भावुक महिलाएँ’ और ‘भावनाहीन लड़के’ की सोच। इसे ब्रोकूट जोक्स या ब्रोकूट कल्चर का हिस्सा माना गया, जहाँ ब्रोकूट के तार पितृसत्ता से जुड़े रहे Feminism in IndiaMediumThe Indian Express।
5. कॉमेडी, जेंडर और इंडस्ट्री में लैंगिक असंतुलन
यह विवाद केवल ज़ाकिर तक सीमित नहीं है—कॉमेडी इंडस्ट्री को वर्षों से लैंगिक असंतुलन और सेक्सिस्ट सामग्री के लिए आलोचना मिल रही है।
- Aditi Mittal, जो कॉमेडी पैनल में अकेली महिला थीं, उन्हें पुरुष समकक्षों द्वारा टॉपिक से हटाकर बातचीत से बाहर कर दिया गया था—aajka papers पर क्लब डिबेट में यह स्पष्ट हुआ कि ये इंडस्ट्री में “ब्रोकूट कोड” के चलते महिलाओं को सीमित करती है The Indian Express+1।
- कई हाई-प्रोफाइल महिला कॉमेडियनों को खुद-हिंसात्मक या बॉडी-शेमिंग जोक्स से ही खुद को सफल दिखाना पड़ा, यानी उन्हें सकर्मक स्टेज पर बचे रहने के लिए स्त्री-स्टीरियोटाइप का उपयोग करना पड़ा The Indian Express।

6. क्या हो सकता है आगे? ज़िम्मेदारी और सशक्त कॉमेडी की अपेक्षा
- कॉमेडियन के लिए: ज़ाकिर जैसे कलाकारों को हर – हर जोक नए दौर की सोच के साथ आज़माना चाहिए—जहाँ सामाजिक संदर्भ और भावनात्मक संवेदनशीलता भी साथ हो।
- दर्शकों के लिए: हमें यह समझना होगा कि पारंपरिक “relatable jokes” अब कई बार पुराने, असंवेदनशील नजरियों को बढ़ावा देते हैं। ऐसे समय में सशक्त, समावेशी, और जिम्मेदार कॉमेडी को तरजीह मिले।
- इंडस्ट्री के लिए: मंच पर महिलाओं की संख्या बढ़ाने और लैंगिक संतुलन की दिशा में काम करना, ताकि हास्य सिर्फ हंसी का जरिया न रहे, बल्कि एक सकारात्मक सामाजिक संवाद भी बने।
7. निष्कर्ष:
निष्कर्ष—ज़ाकिर खान का MSG शो सांस्कृतिक उपलब्धि है, लेकिन उसी के साथ पुरानी टिप्पणियों की चर्चा यह दिखाती है कि कॉमेडी में विकास और जिम्मेदारी दोनों साथ-साथ जरूरी हैं।
कॉमेडी केवल मज़ा देने की माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव और संवेदनशीलता का जरिया भी हो सकता है—जब कलाकार अपनी शैली में सुधार और संवेदनशीलता लाएं, तभी हंसी में हर किसी के लिए जगह रहेगी।
ज्यादा जानने के लिए विज़िट करें aajka papers.com”
